What is Vertigo? (In Hindi)2018-07-19T16:04:13+00:00

वर्टिगो (चक्कर आना)

वर्टिगो का अर्थ है – सिर घूमना या चक्कर आना। वर्टिगो घूमने का एक अहसास या असंतुलन की अनुभुति है। इसके लक्षणों, कारणों और उपचार के बारे में अधिक जानें

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वर्टिगो शब्द लैटिन भाषा वर्टो से लिया गया है। इसका अर्थ है – घूमना। वर्टिगो घूमने का एक अहसास या असंतुलन की अनुभुति है। इससे पीड़ित रोगी को चक्कर आते हैं या असंतुलन रहता है।

यह असंतुलन के दौरान जी मिचलाना, उल्टी आना, अधिक पसीने आना अथवा चलने में अस्थिरता का एहसास हो सकता है। सिर हिलाने पर चक्कर बढ़ सकते हैं। वर्टिगो को कुछ लोग अधिक उंचाई पर जाने का डर समझते हैं, लेकिन इस बीमारी को एक्रोफोबिया कहते हैं। यह वर्टिगो नहीं है।

वर्टिगो और डिजीनेस सभी क्षेत्र के चिकित्सकों के लिये सामान्य शिकायत है और सभी आयु वर्ग के व्यक्ति इससे प्रभावित हो सकते हैं। हकीकत में 20 से 40 फीसदी लोग अपने जीवन के किसी भी क्षण डिजीनेस या सिर चकराने से पीड़ित होते हैं, इनमें से 15 प्रतिशत को डिजीनेस और 5 प्रतिशत 

आबादी को उपरोक्त दिये गये वर्षों में कभी भी वर्टिगो की शिकायत रह सकती है, सभी प्राथमिक देखभाल आंगतुकों में से 2.5 प्रतिशत को डिजीनेस की शिकायत पाई गई और विकसित राष्ट्रों से यह आपात स्थिति में आने वाले 2-3 प्रतिशत लोग वर्टिगो से पीड़ित पाए गए।

वर्टिगो शरीर में विकार का लक्षण हैं, यह कोई रोग नहीं है। वर्टिगो कई कारण से हो सकता हैं, जैसे – बीपीपीवी, मेनिस डिजिस, वेस्टिब्यूलर न्युरीटाईस, लेबिन्थटिक्स, एक्युस्टिक न्युरोमा, ओटोलिथ डिसफंक्शन , वेस्टब्युलर माईग्रेन, सेन्ट्रल वेस्टीबलोपेथी या साईकोजोनिक डिसआर्डस। वर्टिगो या चक्कर का निदान करके सही ईलाज से ठीक किया जा सकता है। इन सभी बीमारियों की अलग अलग प्रस्तुति होती हैं और उपचार का तरीका अलग होता है। सही निदान एंव तर्कसंगत उपचार के बाद ही रोगी को स्थाई लाभ मिल सकता है।

चक्कर के लक्षण:-

चक्कर के मरीज इस प्रकार से अपने लक्षण का वर्णन कर सकते हैं:-

1. चक्कर आना।

2. अस्थिर या असंतुलित महसूस करना।

3. गिरने का एहसास।

4. सिर घूमना।

वर्टिगो के रोगी में चक्कर के साथ कुछ लक्षण पाए जा सकते हैं, जैसे:- कम सुनाई देना, कान में आवाजें आना या सिरदर्द होना।

कारण, निदान एवं उपचार

बीपीपीवी : ऐसे चक्कर आमतौर पर सोने व करवट बदलने पर आते हैं जो कान की भीतरी शिराओं में कैल्शियम कार्बोनेट का मलबा जमने के कारण होता है। बीपीपीवी अधिकांशतः बुजुर्ग रोगियों में, सिर पर चोट के बाद, लम्बे समय तक बिस्तर पर आराम करने के बाद और भीतरी कान में संक्रमण के कारण होता हैं। सिर का चक्कर आमतौर पर विडियो निस्टैगमो ग्राफी परिक्षण से स्थिति को मार्गदर्शित किया जाता है, और इसका भीतरी कान में फंसे कणों की स्थिति देखने के बाद ही इसका ईलाज किया जाता है।

मेनीयार्स का रोग: ये कान के भीतरी हिस्से के रोग के कारण होता हैं, जिससे रोगी के सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, कान में आवाजें आती हैं और कुछ घन्टों के चक्कर आते हैं। यह भीतरी कान के तरल पदार्थ के बहते हुए दबाव के कारण होता है। अगर समय पर ईलाज नहीं किया गया तो मेनीयर्स रोग से सुनवाई की हानी हो सकती है। मेनीयर्स रोग आमतौर पर एक कान को प्रभवित करता है, लेकिन यह 15 फीसदी मामलों में इससे दोनों कान प्रभावित हो सकते हैं। इसका उपचार खानपान में बदलाव और दवाईयों से और अग्रिम स्थिति में कान के अन्दर इन्ट्राटिमपेनिक जेन्टामायसिन इंजेक्शन या सर्जरी की आवश्यकता होती है।

वेस्टिबूलर न्युरैटिस: यह संतुलन की नस का वायरल संक्रमण है। इन मरीजों में वर्टिगो आमतौर पर घण्टों से लेकर कई दिन के लिये रहता है। समय पर निदान एवं कसरत शुरू करने से संतुलन की क्षमता को सामान्य बनाया जा सकता हैं।

आॅथोलिथिक विकार: इस रोग में मरीज को असंतुलन का अहसास या सीधे खड़े रहने में परेशानी होती है। आॅथोलिथिक विकार रोग को सब्जैक्टिव विजुअल वर्टीकल टेस्ट एवं वीईएमपी परीक्षण करने से पता चलता है। इसका उपचार तंत्रिका तंत्र की संवेदनशीलता को कम करने के लिये दवा के साथ आॅटोलिथ विकारों के लिये एक विषेष पुर्नवास कार्यक्रम में शामिल किया जाता है।

मालडीडिबारकमेंट सिंड्रोम (एमडीडीएस): यह एक असामान्य स्थिति है जिसमें मरीज को नाव पर चलने या फोम पर चलने की तरह अनुभुति होती है। यह आमतौर पर नाव की लम्बी यात्रा या लम्बी उड़ान के बाद होता है। हालांकि यह जरूरी नहीं हैं कि यह स्थिति यात्रा के बाद ही हो। कार में बैठकर या कार चलाने से इस रोग के लक्षण अस्थाई रूप से कम हो जाते है। महिलाओं में यह रोग पुरूषों की अपेक्षा ज्यादा रहता है। इन रोगियों का आॅप्टोकायनिटिक विज्युअल स्टिमुलेशन एवं विशिष्ट पुर्नवास कार्यक्रम में शामिल करने से फायदा मिलता है।

आॅक्योस्टिक न्युरोमा: यह संतुलन नस में एक टयुमर यानि एक गांठ के रूप में होता है जिस कारण बढ़ती अस्थिरता, एक कान से सुनाई देने में बाधा एवं कान में आवाजें आने के लक्षण होते हैं। यह टयुमर आमतौर पर धीमी गति से बड़ा होता है। इसका निदान आॅडियोलोजिकल टेस्ट जैसे प्योर टोन आॅडियोमीटरी एवं एबीआर, वेस्टिब्युलर टेस्ट और एमआरआई है।

पेरीलिम्फ फिस्टूला: यह भीतरी कान में भरी तरल और बाहय कान में भरी हवा के असामान्य सम्पर्क के कारण होता है। भीतरी कान के तरल पदार्थ मध्य कान में पेरिलिम्फ तरल पदार्थ रिसकर मध्य कान में प्रवाहित होता है जिस कारण कम सुनाई देना, कान में भारीपन और चक्कर महसूस किये जाते हैं। ये लक्षण खांसने, छींकने व भारी वजन उठाने पर बढ़ जाते हैं। फिस्टूलाज में सबसे अधिक आघात हालांकि भारी वजन उठाने पर होता है, लेकिन यह ड्राईविंग के दौरान, उड़ान में या प्रसव के दौरान दबाव में अचानक परिवर्तन से होता है। इसका निदान रोगी के इतिहास पर निर्भर है। वेस्टिब्युलर परिक्षण और लक्षणों में इसका निदान किया जाता है। उपचार के लिए दूरबीन से आॅपरेशन करके पेरिलिम्फ फिस्टूला का सुधार किया जाता है। आॅपरेशन के बाद मरीज को कुछ दिन के लिये बिस्तर पर आराम की सलाह दी जाती है।

लाब्रिनिथिटक्स: यह रोग संतुलन नस का जिवाणु संक्रमण के कारण होता है, जिससे एक कान में अचानक कम सुनाई देने के साथ तीव्र वर्टीगो या कान का भारीपन, कम सुनाई देना, कान में आवाजें आना व कुछ दिन के चक्कर इस रोग के लक्षण हैं, लाब्रिनिथिटक्स का शीघ्र निदान और सही उपचार से सुनवाई की क्षति को रोका जा सकता है। असंतुलन व चक्कर का ईलाज विशेष प्रकार के व्यायाम से किया जाता है।

वेस्टिब्युलर माईग्रेन: वेस्टिब्युलर माईग्रेन एक सामान्य कारणों में से एक हैं। सिर में दर्द व चक्कर आना बहुत आम बात है जो सभी आयुवर्ग में सामान्य लक्षण हैं। यह निर्धारित करने के लिये कि क्या दो लक्षण जुड़े या एक दूसरे से स्वतंत्र या माईग्रेन के कारण कर रहे हैं, महत्वपूर्ण हैं। इन रोगियों को आमतौर पर सुनाई की समस्या नहीं होती है व अक्सर तेज आवाज या चमकदार रोशनी को सहन नहीं कर पाते हैं। उपचार जीवन शैली में बदलाव, खानपान में बदलाव एवं दवाईयों से काबू किया जाता हैं। आमतौर पर कई महिनों तक ईलाज लेना पड़ता है।

वेस्टिब्युलर परोक्सिमिया: यह हडडी के अन्दर संतुलन की नस के दबाव के कारण होता है। इसमें अल्प अन्तरल में तेज वर्टिगो एंव असंतुलन का आभास होता है। स्पाॅन्टेनियस न्यासिटमग्स विद हायपरवेंटिलेशन, वेस्टिब्युलर पराक्सिमिया के निदान के लिये उच्च स्तर पर सुझाया गया है। इसके साथ ही एमआरआई (गादोलिनियम) से 95 प्रतिशत स्थिति का निदान किया जा सकता है। इस रोग को सीजर डिस्आॅर्डर से अलग करना पड़ता है। शुरू में चिकित्सा प्रबन्धन कार्बामेजीपिन या आॅक्सार्बमेजीपाईन द्वारा किया जा सकता है। यदि दवाईयों से पर्याप्त नियंत्रण संभव नहीं हो तो ऐसे में सर्जीकल माईक्रोवेस्कुलर डिकम्प्रेशन आॅफ द वेस्टिब्युलर नर्व किया जा सकता है। इससे संतुलन की नस को दबाव से मुक्त किया जा सकता है।

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