आम सवाल
वर्टिगो एक प्रकार का चक्कर है जिसमें व्यक्ति को घूमने, झुकने या डगमगाने का झूठा एहसास होता है, जबकि वास्तव में वह हिल नहीं रहा होता है। यह केवल हल्का चक्कर महसूस होना नहीं है; बल्कि यह एक परेशान करने वाला एहसास है जिसमें आसपास की चीजें घूमती हुई लगती हैं। लोग इसे अक्सर “चक्कर” या अचानक संतुलन बिगड़ने जैसा बताते हैं। वर्टिगो कभी-कभी बहुत तेज हो सकता है और इससे मतली, घबराहट तथा रोज के काम करने में कठिनाई हो सकती है। यह तब होता है जब आंखों, इनर ईयर और दिमाग से मिलने वाले संकेत (जो आपको संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं) में असंतुलन होता है।
मने या चक्कर आने का एहसास | संतुलन बिगड़ना या अस्थिर महसूस होना | मतली या उल्टी | दृष्टि से जुड़ी समस्याएं | हलचल (गति) के प्रति संवेदनशीलता | तेज रोशनी | कान से जुड़े लक्षण जैसे आवाज आना (टिनिटस), सुनने में कमी या कान भरा हुआ महसूस होना | खड़े होने या चलने में कठिनाई
वर्टिगो कोई बीमारी नहीं बल्कि एक लक्षण है। यह कई अंदरूनी समस्याओं के कारण हो सकता है, खासकर इनर ईयर या दिमाग से जुड़ी समस्याओं के कारण। इसके 40 से अधिक ज्ञात कारण हैं। सही इलाज के लिए सही कारण की पहचान जरूरी है। वर्टिगो के सामान्य कारण: बेनाइन पैरॉक्सिस्मल पोजिशनल वर्टिगो (BPPV) यह तब होता है जब इनर ईयर में मौजूद कैल्शियम क्रिस्टल अपनी जगह से हट जाते हैं, जिससे खासकर सिर हिलाने पर तेज और अचानक घूमने जैसे चक्कर आने लगते हैं। मेनिएर्स डिजीज यह इनर ईयर की एक पुरानी बीमारी है जिसमें बार-बार वर्टिगो, सुनने में कमी, टिनिटस और कान में दबाव महसूस होता है। यह इनर ईयर में तरल पदार्थ जमा होने से जुड़ी होती है। वेस्टिबुलर न्यूराइटिस / लैब्रिंथाइटिस वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण जो बैलेंस नर्व या इनर ईयर में सूजन पैदा करते हैं। इसके लक्षण कई दिनों तक रह सकते हैं और इसके साथ मतली या उल्टी भी हो सकती है। वेस्टिबुलर माइग्रेन यह माइग्रेन का एक प्रकार है जिसमें वर्टिगो मुख्य लक्षण होता है, भले ही सिरदर्द न हो। यह अक्सर तेज रोशनी, आवाज या हलचल से ट्रिगर होता है। न्यूरोलॉजिकल स्थितियां स्ट्रोक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या ब्रेन ट्यूमर दिमाग के बैलेंस सेंटर को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वर्टिगो हो सकता है। सिस्टमिक कारण और दवाओं के साइड इफेक्ट्स ब्लड प्रेशर में बदलाव, एनीमिया, डायबिटीज और कुछ दवाएं (जैसे टीबी की दवाएं, ओटोटॉक्सिक एंटीबायोटिक्स) भी वर्टिगो को ट्रिगर कर सकती हैं।
वर्टिगो का समय और इसकी अवधि इसके कारण पर निर्भर करती है। बेनाइन पैरॉक्सिस्मल पोजिशनल वर्टिगो (BPPV) में यह आमतौर पर सिर की खास गतिविधियों जैसे बिस्तर पर करवट बदलने या ऊपर देखने पर होता है और कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक रहता है। मेनिएर्स डिजीज में वर्टिगो अचानक शुरू होता है और कई घंटों तक रह सकता है; साथ में सुनने में कमी या कान में आवाज भी हो सकती है। वेस्टिबुलर न्यूराइटिस, जो आमतौर पर वायरल संक्रमण के कारण होता है, कई दिनों तक गंभीर वर्टिगो पैदा कर सकता है। वेस्टिबुलर माइग्रेन में वर्टिगो कुछ सेकंड से लेकर कई दिनों तक रह सकता है और यह सिरदर्द के साथ या बिना भी हो सकता है। सही पहचान और उचित इलाज से ज्यादातर मामलों में वर्टिगो को नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है।
दातर मामलों में वर्टिगो स्थायी नहीं होता है और सही कारण की पहचान होने पर इसका प्रभावी इलाज किया जा सकता है। कई मरीज व्यक्तिगत ट्रीटमेंट प्लांस के माध्यम से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, जिसमें वेस्टिबुलर रिहैबिलिटेशन थेरेपी (VRT), BPPV के लिए रीपोजिशनिंग तकनीक, दवाएं, लाइफस्टाइल सलाह और कुछ मामलों में विशेष न्यूरो-ओटोलॉजिकल उपचार शामिल हो सकते हैं। समय पर पहचान और सही इलाज बहुत जरूरी है। यदि वर्टिगो का इलाज न हो या गलत पहचान हो जाए, तो चक्कर आने के लक्षण बने रह सकते हैं या समय के साथ बिगड़ सकते हैं।
वर्टिगो की जांच में चक्कर और संतुलन की समस्या के असली कारण का पता लगाने के लिए पूरी जांच की जाती है। इसकी शुरुआत मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों की जानकारी से होती है, जिसके बाद शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल जांच की जाती है। समस्या के मुख्य कारण का पता लगाने के लिए विशेष टेस्ट किए जाते हैं। इनमें वीडियोनिस्टैग्मोग्राफी (VNG) द्वारा आंखों की गतिविधियों की जांच, वीडियो हेड इम्पल्स टेस्ट (vHIT) द्वारा सेमिकर्कुलर कैनाल्स की कार्यक्षमता की जांच और सब्जेक्टिव विजुअल वर्टिकल (SVV) द्वारा दिमाग की संतुलन संबंधी जांच शामिल हो सकती है। अतिरिक्त टेस्ट इनर ईयर और नर्व फंक्शन की जांच में मदद करते हैं, जबकि सुनने की क्षमता की जांच के लिए ऑडियोमेट्री की जाती है। केवल कुछ असाधारण मामलों में MRI या CT स्कैन की सलाह दी जाती है ताकि संरचनात्मक (स्ट्रक्चरल) या न्यूरोलॉजिकल समस्याओं की संभावना को खारिज किया जा सके। उचित ट्रीटमेंट प्लान के लिए सही कारण की पहचान बहुत जरूरी है।
चक्कर आने (वर्टिगो) की स्थिति में तुरंत कदम उठाना ज़रूरी है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और लक्षणों की तीव्रता कम हो सके। जैसे ही चक्कर महसूस हो, तुरंत बैठ जाना या लेट जाना जरूरी है ताकि गिरने से बचा जा सके। सिर को अचानक हिलाने से बचना और शांत रहना असुविधा को कम करने में मदद करता है। सिरदर्द या नजर में बदलाव जैसे अन्य लक्षणों पर ध्यान देना भी डॉक्टरों को कारण समझने में मदद करता है। लंबे समय का इलाज इसके कारण पर निर्भर करता है। BPPV वाले मरीजों में एप्ली या ज़ूमा जैसी कैनालिथ रीपोजिशनिंग तकनीक इनर ईयर के हटे हुए क्रिस्टल्स को सही जगह पहुंचाने में मदद करती है और अक्सर जल्दी राहत देती है। वेस्टिबुलर सप्रेसेंट जैसी दवाओं का उपयोग तीव्र दौरों में थोड़े समय के लिए किया जा सकता है, लेकिन आमतौर पर लंबे समय तक इनका उपयोग नहीं किया जाता जब तक डॉक्टर सलाह न दें। कई मामलों में वेस्टिबुलर रिहैबिलिटेशन थेरेपी (VRT) बहुत फायदेमंद होती है। इसमें प्रशिक्षित और विशेषज्ञ फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में बैलेंस और नजर स्थिर रखने वाली विशेष एक्सरसाइज कराई जाती हैं, जो दिमाग को सामंजस्य बिठाने और क्षतिपूर्ति (कंपनसेट) करने में मदद करते हैं, खासकर वेस्टिबुलर न्यूराइटिस या लंबे समय से चल रहे चक्कर में। इसके अलावा जीवनशैली (लाइफस्टाइ) और खानपान में बदलाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। योग, मेडिटेशन या काउंसलिंग के माध्यम से तनाव कम करना, नियमित नींद लेना, पर्याप्त पानी पीना और ब्लड शुगर को स्थिर रखना लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करता है। मेनिएर्स डिजीज जैसी स्थितियों में नमक कम लेने की सलाह दी जाती है। कैफीन, शराब और कुछ विशेष खाने की वस्तुओं से बचना भी दोबारा वर्टिगो होने से रोक सकता है।
हां। तनाव और चिंता वर्टिगो के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं और उन्हें और भी गंभीर बना सकते हैं। खासकर वेस्टिबुलर माइग्रेन या लंबे समय से चल रहे चक्कर में तनाव को नियंत्रित (कंट्रोल) करने की तकनीकें बहुत जरूरी होती हैं।
नहीं। सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस गर्दन से जुड़ी एक डीजनरेटिव समस्या है, लेकिन वर्तमान मेडिकल समझ के अनुसार यह सीधे वर्टिगो का कारण नहीं बनती। क्या वर्टिगो खतरनाक होता है? वर्टिगो आमतौर पर जानलेवा नहीं होता है, लेकिन यह परेशान करने वाला और डर पैदा करने वाला हो सकता है, खासकर जब यह अचानक हो। बुजुर्गों में इससे गिरने का खतरा काफी बढ़ जाता है, जिससे गंभीर चोट लग सकती है। हालांकि ज्यादातर कारण सामान्य होते हैं, लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में यह स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या न्यूरोलॉजिकल बीमारी का संकेत भी हो सकता है। यदि वर्टिगो के साथ अचानक तेज सिरदर्द, अस्पष्ट बोलना, नजर कम होना या हाथ-पैरों में कमजोरी हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर जांच गंभीर कारणों को पहचानने और सही इलाज शुरू करने में मदद करती है। क्या वर्टिगो से हाई ब्लड प्रेशर हो सकता है? वर्टिगो सीधे हाई ब्लड प्रेशर का कारण नहीं बनता है। हालांकि, इसका उल्टा संबंध अधिक आम है; यानी ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव, किसी बीमारी या दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण चक्कर या वर्टिगो हो सकता है। कुछ ब्लड प्रेशर की दवाएं, खासकर जो खून के बहाव को या शरीर में पानी के स्तर को प्रभावित करती हैं, संतुलन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकती हैं। ब्लड प्रेशर और वर्टिगो के लक्षणों की एक साथ निगरानी करने से पैटर्न की पहचान करने और उचित इलाज में मदद मिल सकती है।
हालांकि केवल खानपान से वर्टिगो ठीक नहीं होता, लेकिन मेनिएर्स डिजीज और वेस्टिबुलर माइग्रेन जैसी स्थितियों में यह महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभाता है। खानपान में कुछ विशेष बदलाव करने से वर्टिगो के दौरों के बार-बार होने तथा उनकी गंभीरता को कम करने में मदद मिल सकती है। नमक कम लेना इनर ईयर में तरल दबाव को नियंत्रित करने में मदद करता है। कैफीन और शराब कम करना भी कुछ लोगों में लक्षण बढ़ने से रोक सकता है। पर्याप्त पानी पीना और पूरे दिन ब्लड शुगर को स्थिर रखना संतुलन और ऊर्जा के लिए जरूरी है। व्यक्तिगत फूड ट्रिगर्स की पहचान करके उनसे बचना भी फायदेमंद हो सकता है, खासकर माइग्रेन में।
हां, वर्टिगो के साथ कभी-कभी सिरदर्द हो सकता है, खासकर वेस्टिबुलर माइग्रेन जैसी स्थितियों में जहां दोनों लक्षण आपस में जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में चक्कर या घूमने जैसे एहसास के साथ माइग्रेन का सिरदर्द, तेज रोशनी या आवाज के प्रति संवेदनशीलता और मतली भी हो सकती है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर प्रकार का वर्टिगो सिरदर्द से जुड़ा नहीं होता है। सिरदर्द का होना या न होना डॉक्टरों को कारण पहचानने और सही इलाज तय करने में मदद करता है।
सबसे पहले डॉक्टर से चक्कर की जाँच ज़रूर करवाएँ, क्योंकि सही इलाज इसकी वजह पर ही निर्भर करता है। घर पर सबसे ज़रूरी बात है - बुज़ुर्ग को सुरक्षित रखना और गिरने से बचाना। चक्कर शुरू होते ही तुरंत बैठ जाएँ या लेट जाएँ। बिस्तर से धीरे-धीरे उठें - खड़े होने से पहले एक मिनट बिस्तर के किनारे बैठें। भरपूर पानी पिएँ और खाना समय पर खाएँ, उसे छोड़ें नहीं। घर को सुरक्षित बनाएँ: रात में हल्की रोशनी (नाइट लाइट) जलाकर रखें, बाथरूम में पकड़ने के लिए हैंडल (grab bars) लगवाएँ, और फिसलने वाले ढीले पायदान या दरियाँ हटा दें। अगर डॉक्टर कहें, तो चलने के लिए छड़ी (वॉकिंग स्टिक) का इस्तेमाल करें। अभी चल रही सभी दवाएँ डॉक्टर को दिखाएँ, क्योंकि कुछ दवाओं से भी चक्कर आ सकता है। घर पर कोई भी एक्सरसाइज़ तभी करें, जब डॉक्टर ने आपको उसका सही तरीका सिखा दिया हो।
सिर हल्का लगना, घूमने वाले चक्कर (वर्टिगो) से अलग है। इसमें कमरा घूमता हुआ नहीं लगता। बल्कि ऐसा लगता है जैसे आप बेहोश होने वाले हैं, या सिर हल्का और खाली-खाली सा लगता है। ऐसा आमतौर पर तब होता है, जब कुछ पल के लिए दिमाग तक पूरा खून नहीं पहुँच पाता। इसकी आम वजहें हैं: बहुत जल्दी खड़े हो जाना, लो ब्लड प्रेशर, कम पानी पीना, खाना छोड़ देना, शुगर कम होना, खून की कमी (एनीमिया), तनाव, और कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट। अगर ऐसा कभी-कभार होता है, तो आमतौर पर यह गंभीर नहीं होता। लेकिन अगर यह बार-बार हो, आप बेहोश हो जाएँ, या इसके साथ सीने में दर्द हो या दिल की धड़कन तेज़ हो जाए, तो जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाएँ।
सिर हल्का लगना, घूमने वाले चक्कर (वर्टिगो) से अलग है। इसमें कमरा घूमता हुआ नहीं लगता। बल्कि ऐसा लगता है जैसे आप बेहोश होने वाले हैं, या सिर हल्का और खाली-खाली सा लगता है। ऐसा आमतौर पर तब होता है, जब कुछ पल के लिए दिमाग तक पूरा खून नहीं पहुँच पाता। इसकी आम वजहें हैं: बहुत जल्दी खड़े हो जाना, लो ब्लड प्रेशर, कम पानी पीना, खाना छोड़ देना, शुगर कम होना, खून की कमी (एनीमिया), तनाव, और कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट। अगर ऐसा कभी-कभार होता है, तो आमतौर पर यह गंभीर नहीं होता। लेकिन अगर यह बार-बार हो, आप बेहोश हो जाएँ, या इसके साथ सीने में दर्द हो या दिल की धड़कन तेज़ हो जाए, तो जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाएँ।
नींद और चक्कर एक साथ महसूस होने की आम वजहें हैं: ठीक से नींद न होना, कम पानी पीना, शुगर कम होना, लो ब्लड प्रेशर, खून की कमी, थायरॉइड की समस्या या बुखार। कुछ दवाएँ - जैसे एलर्जी की गोलियाँ, नींद की गोलियाँ और चक्कर की कुछ दवाएँ - भी सुस्ती और चक्कर ला सकती हैं। जिन लोगों को संतुलन की समस्या होती है, वे भी जल्दी थक जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें स्थिर रखने के लिए दिमाग को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन अगर अचानक नींद और चक्कर के साथ बात समझने में उलझन, ज़ुबान लड़खड़ाना, चेहरा एक तरफ़ लटक जाना, या एक हाथ या पैर में कमज़ोरी हो, तो तुरंत अस्पताल जाएँ। यह ब्रेन स्ट्रोक हो सकता है।
नहीं, BPPV से जान का कोई खतरा नहीं होता। यह चक्कर आने की सबसे आम वजहों में से एक है, और इसका इलाज भी सबसे आसान है। इसमें सबसे बड़ा खतरा अचानक तेज़ चक्कर आने पर गिर जाने का है। इससे चोट लग सकती है, खासकर बुज़ुर्गों को। BPPV के इलाज में आमतौर पर स्पेशलिस्ट आपके सिर को कुछ खास तरीकों से घुमाते हैं, जैसे Epley maneuver। इससे कान के अंदर खिसके हुए छोटे क्रिस्टल वापस अपनी जगह पहुँच जाते हैं। कई लोगों को एक या कुछ ही सेशन में आराम मिल जाता है। कुछ लोगों में यह दोबारा हो सकता है, लेकिन इसका इलाज फिर से उतनी ही आसानी से हो जाता है।
हाँ, अक्सर ऐसा होता है। BPPV में यह सबसे आम है। इसमें लेटने, बिस्तर पर करवट लेने, उठने, ऊपर देखने या नीचे झुकने पर थोड़ी देर के लिए तेज़ चक्कर आता है। Vestibular migraine (माइग्रेन का एक प्रकार, जिसमें चक्कर आता है), PPPD में, और कान के अंदरूनी इन्फ़ेक्शन से ठीक होने के दौरान भी हिलने-डुलने से चक्कर बढ़ सकता है। जल्दी खड़े होने पर चक्कर आना आमतौर पर ब्लड प्रेशर से जुड़ा होता है, कान से नहीं। वहीं Ménière’s disease (मेनियर रोग) में चक्कर के दौरे आमतौर पर बिना किसी हरकत के, अपने-आप आते हैं। किस चीज़ से आपको चक्कर आता है, इस पर ध्यान रखें। इससे डॉक्टर को चक्कर की वजह पता लगाने में मदद मिलती है।
BPPV में चक्कर का आमतौर पर एक साफ़ पैटर्न होता है। अचानक तेज़ चक्कर आता है, जो एक मिनट से कम समय तक रहता है। यह सिर को कुछ खास तरीकों से हिलाने पर होता है - जैसे बिस्तर पर करवट लेना, लेटना, उठकर बैठना, ऊपर देखना या नीचे झुकना। इन दौरों में जी मिचला सकता है, और दो दौरों के बीच भी थोड़ी लड़खड़ाहट महसूस हो सकती है। BPPV से आमतौर पर सुनने पर कोई असर नहीं पड़ता, और कान में घंटी या सीटी जैसी आवाज़ भी नहीं आती। डॉक्टर क्लिनिक में ही एक आसान टेस्ट से इसकी पुष्टि कर सकते हैं। इसमें वे आपका सिर कुछ खास पोज़िशन में ले जाकर आपकी आँखों की हरकत देखते हैं।
ज़्यादातर लोगों में नहीं। चक्कर की सबसे आम वजहें - जैसे BPPV और कान के अंदरूनी हिस्से का इन्फ़ेक्शन - सही इलाज से आमतौर पर पूरी तरह ठीक हो जाती हैं। अगर कान पूरी तरह ठीक न भी हो, तो संतुलन की खास एक्सरसाइज़ (vestibular rehabilitation therapy) दिमाग को नई स्थिति के हिसाब से ढलना सिखाती हैं। इससे ज़्यादातर लोग अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट आते हैं। कुछ बीमारियाँ, जैसे Ménière’s disease और vestibular migraine, लंबे समय तक चल सकती हैं। लेकिन दवाओं, खान-पान में बदलाव, अच्छी दिनचर्या और थेरेपी से इन्हें अच्छी तरह कंट्रोल में रखा जा सकता है। सही जाँच और सही इलाज से, चक्कर के ज़्यादातर मरीज़ सामान्य ज़िंदगी जीते हैं।
PPPD लंबे समय तक बना रहने वाला चक्कर है। महीनों तक चक्कर बने रहने की सबसे आम वजहों में से यह एक है। PPPD में लगभग हर दिन, तीन महीने या उससे ज़्यादा समय तक, अस्थिरता महसूस होती है - जैसे आप डोल रहे हों या झूल रहे हों, मानो नाव में बैठे हों। आमतौर पर कमरा घूमता हुआ नहीं लगता। यह अक्सर तब शुरू होता है, जब किसी वजह से संतुलन बिगड़ जाता है - जैसे चक्कर का दौरा, कान का इन्फ़ेक्शन, सिर में चोट, या पैनिक अटैक (अचानक तेज़ घबराहट का दौरा)। वह समस्या ठीक हो जाने के बाद भी दिमाग संतुलन को लेकर “हाई अलर्ट” पर बना रहता है, और इसी वजह से चक्कर चलता रहता है। PPPD, MRI या CT स्कैन में नहीं दिखता। डॉक्टर आपके लक्षणों के आधार पर इसकी पहचान करते हैं।
हाँ, PPPD में काफ़ी सुधार हो सकता है। सही इलाज से कई लोग पूरी तरह या लगभग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। लेकिन इलाज न हो, तो यह महीनों या सालों तक भी चल सकता है। कई लोग उन जगहों या कामों से बचने लगते हैं, जिनसे उन्हें चक्कर आता है। लेकिन इससे PPPD असल में और बढ़ सकता है, क्योंकि दिमाग को दोबारा ढलने का मौका ही नहीं मिलता। जल्दी पहचान, इस समस्या को ठीक से समझना, और संतुलन की एक्सरसाइज़ के साथ सही इलाज का प्लान फ़ॉलो करना - इनसे ठीक होने की सबसे अच्छी उम्मीद रहती है।
PPPD का इलाज तब सबसे अच्छा होता है, जब कई तरीकों को मिलाकर हर मरीज़ के लिए अलग प्लान बनाया जाए। संतुलन की खास एक्सरसाइज़ (vestibular rehabilitation therapy) प्रशिक्षित फ़िज़ियोथेरेपिस्ट की देखरेख में कराई जाती हैं। ये धीरे-धीरे दिमाग को सिखाती हैं कि वह हिलने-डुलने और भीड़-भाड़ वाले माहौल पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया न दे। डॉक्टर कुछ ऐसी दवाएँ भी दे सकते हैं, जो दिमाग के संतुलन सिस्टम को शांत करती हैं। ये दवाएँ कभी-कभी घबराहट (anxiety) या डिप्रेशन में भी दी जाती हैं, लेकिन PPPD में ये तब भी मदद करती हैं, जब आपको इनमें से कोई समस्या न हो। बातचीत वाली थेरेपी (CBT) से चिंता और गिरने का डर कम करने में मदद मिलती है। अगर संतुलन से जुड़ी कोई और समस्या भी है, जैसे BPPV या माइग्रेन, तो उसका इलाज भी ज़रूरी है। चक्कर की आम गोलियाँ PPPD में आमतौर पर फ़ायदा नहीं करतीं।
PPPD कम से कम तीन महीने तक रहता है - इसकी पहचान का एक आधार यही है। इलाज न हो, तो यह कई महीनों या सालों तक भी चल सकता है। सही इलाज से ज़्यादातर लोगों को कुछ हफ़्तों से लेकर कुछ महीनों में फ़र्क महसूस होने लगता है। संतुलन की एक्सरसाइज़ कई हफ़्तों तक नियमित रूप से करनी होती हैं, और दवाओं का पूरा असर दिखने में आमतौर पर दो से तीन महीने लगते हैं। ठीक होने की रफ़्तार आमतौर पर धीमी, लेकिन लगातार होती है। कुछ दिन अच्छे होते हैं, कुछ थोड़े मुश्किल। इलाज जारी रखने से ही सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं।
PPPD का मुख्य लक्षण है लगभग हर दिन चक्कर या अस्थिरता महसूस होना। यह आमतौर पर घूमने जैसा नहीं, बल्कि डोलने, झूलने या हवा में तैरने जैसा लगता है। दूसरे आम लक्षण हैं: खड़े होने या चलने पर तकलीफ़ बढ़ना, और लेटने पर आराम मिलना हिलने-डुलने पर, या कार, बस या लिफ़्ट में सफ़र करते समय तकलीफ़ बढ़ना मॉल, बाज़ार और ट्रैफ़िक जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों पर, या फ़ोन पर स्क्रॉल करते समय बेचैनी होना दिन भर लक्षणों का घटना-बढ़ना, और अक्सर शाम तक बढ़ जाना थकान, ध्यान लगाने में मुश्किल, चिंता और गिरने का डर
PPPD आमतौर पर तब शुरू होता है, जब कोई चीज़ आपके संतुलन को बिगाड़ देती है - जैसे BPPV, कान के अंदरूनी हिस्से का इन्फ़ेक्शन, vestibular migraine, Ménière’s disease, सिर में चोट, पैनिक अटैक या बहुत ज़्यादा तनाव। आपको बचाने के लिए दिमाग “सेफ़्टी मोड” में चला जाता है। वह शरीर को अकड़ाकर रखता है, संतुलन के लिए आँखों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर हो जाता है, और हर छोटी-सी हरकत पर चौकन्ना रहता है। आमतौर पर समस्या ठीक होते ही दिमाग फिर से सामान्य हो जाता है। लेकिन PPPD में दिमाग इसी मोड में अटका रह जाता है, और चक्कर बना रहता है। जिन लोगों को ज़्यादा चिंता करने या घबराने की आदत होती है, उनमें PPPD होने की संभावना ज़्यादा होती है। लेकिन यह किसी को भी हो सकता है।
क्या आपको चक्कर आना, सिरदर्द, मतली या कानों में घंटी बजने की समस्या है? इसके मूल कारण का पता लगाएँ। विशेषज्ञ से बात करें।